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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 10
नवमगृहगो बन्योद्वेग श्रमोदररोगकृद् दशमभवने चाज्ञाकर्मप्रसिद्धिकरः शशी । उपचयसुहत्संयोगार्थप्रमोदमुपान्त्यगो वृषभचरितान् दोषानन्त्ये करोति च सव्ययान् ॥
यदि चन्द्रमा नवम राशि में स्थित हो तो बन्धन, उद्वेग, खेद और उदररोग करता है। दशम में हो तो प्रभुता और कर्म की सिद्धि करता है। एकादश में हो तो धन की वृद्धि, मित्र के साथ समागम और धन का प्रमोद करता है तथा द्वादश राशि में चन्द्र हो तो पन की क्षति और बैल के सोंग, खुर आदि से पीड़ित करता है। यह वृषभचरित छन्द है।
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