जन्मन्यायासदोऽर्कः क्षपयति विभवान् कोष्ठरोगाध्वदाता वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति च न सुखं वञ्चनां दृद्युजं च ।
स्थानप्राप्तिं तृतीये घननिचयमुदा कल्यकृच्चारिहर्ता रोगान् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम् ॥
यदि सूर्य जन्मराशि में हो तो उपद्रव, धन का नाश, पेट का रोग और मार्ग में भ्रमण; द्वितीय राशि में हो धन का नाश, दुःख, सभी कार्यों का नाश और नेत्ररोग; तृतीय राशि में हो तो स्थानलाभ, धन- उमूह से युत, आनन्दयुत और शत्रु का नाश तथा चतुर्थ राशि में सूर्य हो तो रोग और माला को धारण करने वाली स्त्री के उपभोग में बार-बार विध्न उत्पन्न करता है। यह सम्परा उन्द है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।