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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 5
जन्मन्यायासदोऽर्कः क्षपयति विभवान् कोष्ठरोगाध्वदाता वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति च न सुखं वञ्चनां दृद्युजं च । स्थानप्राप्तिं तृतीये घननिचयमुदा कल्यकृच्चारिहर्ता रोगान् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम् ॥
यदि सूर्य जन्मराशि में हो तो उपद्रव, धन का नाश, पेट का रोग और मार्ग में भ्रमण; द्वितीय राशि में हो धन का नाश, दुःख, सभी कार्यों का नाश और नेत्ररोग; तृतीय राशि में हो तो स्थानलाभ, धन- उमूह से युत, आनन्दयुत और शत्रु का नाश तथा चतुर्थ राशि में सूर्य हो तो रोग और माला को धारण करने वाली स्त्री के उपभोग में बार-बार विध्न उत्पन्न करता है। यह सम्परा उन्द है।
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