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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 39
प्रथमे रविजे विषवह्निहतः स्वजनैर्वियुतः कृतबन्धुवधः । परदेशमुपैत्यसुहृद्भवनो विमुखार्थसुतोऽटकदीनमुखः ॥
जिसके जन्मराति में शनि हो वह विष और अग्नि से पीड़ित, बन्धुओं से रहित, बन्धु का वध करने वाला, परदेश में जाने वाला, मित्र और गृह से रहित, धन और पुत्र से रहित, भ्रमणशील तथा दीन मुख वाला होता है। यह तोटक छन्द है।
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