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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 33
शुक्रस्य फलं वसन्ततितकेनाह- शुक्के द्वितीयगृहगे प्रसवार्थधान्य- भूपालसन्त्रतकुटुम्बहितान्यवाप्य । संसेवते कुसुमरत्नविभूषितश्च कामं वसन्ततिलकद्युतिपूर्घजोऽपि ॥
यदि द्वितीय राशि में शुक्र हो तो सन्तान, धन, धान्य, राजप्रियता और बन्धुओं से हित कार्यों को प्राप्त करके पुष्प और रत्नों से विभूषित होकर वसन्ततिलका वृक्ष के पुष्पसमान अति बेत बाल होने पर भी कामदेव की सेवा करता है। यह बसन्ततिलका छन्द है।
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