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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 25
जीवे जन्मन्यपगतधनधीः स्थानभ्रष्टो बहुकलहयुतः । प्राप्यार्थेऽर्थान् व्यरिरपि कुरुते कान्तास्याब्जे भ्रमरविलसितम् ॥
जिसके जन्मराशि में बृहस्पति हो, उसके धन और बुद्धि का नाश, स्थान का नारा तथा वह अनेक प्रकार के विरोध से युत होता है। जिसके द्वितीय राशि में बृहस्पति हो, वह धनों को प्राप्त करके शत्रुरहित होकर स्त्री के मुखकमल पर भ्रमर की तरह विलास करता है। यह भ्रमरविलसिता छन्द है।
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