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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 41
सूर्यसुते तृतीयगृहगे धनानि लभते दासपरिच्छदोष्ट्रमहिषाश्वकुञ्जरखरान् सद्मविभूतिसौख्यममितं गदव्युपरमं भीरुरपि प्रशास्त्यधिरिपूंच वीरललितैः ॥
जिसके तृतीय राशि में शनि हो वह पन, नृत्य, परिवार, ऊँट, भैंस, घोड़ा, हाथी, गदहा, गृह, ऐश्वर्य, अति सौख्य और आरोग्य लाभ करता है तथा डरपोक होने पर भी योर चरित्रों के द्वारा प्रबल शत्रु को भी अपने वश में करता है। यह ललिता छन्द
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