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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 50
आदौ यादृक् सौम्यः पश्चादपि तादृशो भवति । उपगीतेर्मात्राणां गणवत् सत्सम्प्रयोगो वा ॥
उपगीति की मात्राओं के गण की तरह या साधुओं के समागम की तरह बुध राशि के आदि और अन्त में समान फल देता है। अर्थात् जैसे उपगीति छन्द में दोनों अर्थ तुल्य लक्षण-लक्षित होते हैं तथा जैसे साधुओं का समागम सदा एक-सा रहता है, उसी तरह बुध राशि के आदि और अन्त में तुल्य फल देता है। यह उपगीति छन्द है ।
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