माण्डव्यगिरं श्रुत्वा न मदीया रोचतेऽथवा नैवम्। साध्वी तथा न पुंसां प्रिया यथा स्याज्जयनचपला ॥
जिन्होंने माण्डव्य ऋषि की वाणी सुनी है, उनको मेरी वाणी अच्छी नहीं लगेगी अथवा इस तरह कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि अपनी साध्वी खी उस प्रकार पुरुषों को प्रिय नहीं लगती, जिस प्रकार जघनचपला (आसाध्वी वेश्या प्रिय होती है।
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