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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 14
रिपुगदकोपभयानि पञ्चमे तनयकृताश्च शुचो महीसुते । द्युतिरपि नास्य चिरं भवेत्स्थिरा शिरसि कपेरिव मालती यथा ॥
• यदि मंगल जन्मराशि से पश्चम राशि में स्थित हो तो शत्रु, रोग, क्रोध, भय और पुत्र के द्वारा शोक होता है तथा जिस तरह वानर के शिर पर मालती-पुष्प अधिक देर तक स्थिर नहीं रहता है, उसी तरह उस मनुष्य की कान्ति भी बहुत देर तक स्थिर नहीं रहती है। यह मालती छन्द है।
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