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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 42
चतुर्थ गृहं सूर्यपुत्रेऽभ्युपेते सुहद्वित्तभार्यादिभिर्विप्रयुक्तः । भवत्यस्य सर्वत्र चासाधु दुाएं भुजङ्गप्रयातानुकारश चित्तम् ॥
जिसके चतुर्य गृह में शनि हो, वह मित्र, धन, खी आदि ( पुत्र और बन्धु) से रहित होता है तथा उसका चित्त सर्वत्र असाधु, दुह और भुजङ्ग (सर्प) के प्रयात (गमन) का अनुकरण करने वाला (अति कुटिल) होता है। यह भुजङ्गप्रयात छन्द रे
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