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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 2
प्रायेण गोचरो व्यवहार्योऽ तस्तत्फलानि वक्ष्यामि । नानावृत्तैरार्या मुखचपलत्वं क्षमध्वं नः ॥
बहुधा इस संसार में ग्रहगोचर का व्यवहार किया जाता है। इसलिये अनेक छन्दों के द्वारा उसके फलों को कहता हूँ। आर्यगण हमारे मुख-चापल्य को क्षमा करें। यह आर्यावृत्तों के अन्तर्गत मुखचपला वृत्त है।
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