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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 54
सूर्यसुतोऽर्कफलसपश्चन्द्रसुतश्छन्दतः समनुयाति यथा। स्कन्धकमार्यागीतिर्वैतालीयं च मागधी गाथाऽऽर्याम् ॥
सूर्य के समान शनि का फल देता है तथा जिस प्रकार संस्कृत में आर्या गीति, प्राकृत में स्कन्धक के, संस्कृत में वैतालीय, प्राकृत में मागधी के और संस्कृत में आर्या, प्राकृत में गाथा के अनुगमन करती है, उसी प्रकार बुध छन्द (परचित्त-ग्रहण) से फल देता है। अर्थात् शुभ ग्रह से युत शुभ और पाप से युत पाप फल देता है।
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