न सखीवदनं तिलकोज्ज्वलं न च वनं शिखिकोफिलनादितम् ।
हरिणप्लुतशावविचित्रितं रिपुगते मनसः सुखदं गुरी ॥
जिसके छठे स्थान में बृहस्पति हो, उसके गृह में सखी का मुख तिलक से उज्ज्वल नहीं होता तथा मसूर और कोकिलों से शब्दायमान, मृगों के कूदने फाँदने से और हरिण शिशुओं से रम्य वन भी उसके मन के लिये आनन्ददायक नहीं होता है। यह हरिणप्लुत छन्द है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।