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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 28
न सखीवदनं तिलकोज्ज्वलं न च वनं शिखिकोफिलनादितम् । हरिणप्लुतशावविचित्रितं रिपुगते मनसः सुखदं गुरी ॥
जिसके छठे स्थान में बृहस्पति हो, उसके गृह में सखी का मुख तिलक से उज्ज्वल नहीं होता तथा मसूर और कोकिलों से शब्दायमान, मृगों के कूदने फाँदने से और हरिण शिशुओं से रम्य वन भी उसके मन के लिये आनन्ददायक नहीं होता है। यह हरिणप्लुत छन्द है।
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