जिसके जन्मति से सप्तम मा अष्टम गृहगत शनि हो, वह मार्ग में गमन करता है तथा खी, पुत्र से हीन और दीन चेष्टा से गुत होता है। नवम राशिगत शनि हो तो पूर्ववत् फल होता है तथा द्वेष और हृदय के रोग से उसका वैश्वदेवो क्रिया आदि धर्म नष्ट होता है। यह वैखदेवी छन्द है
गच्छति।
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