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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 44
गच्छत्यध्वानं सप्तमे चाटमे च हीनः स्त्रीपुत्रैः सूर्यजे दीनचेष्टः । तद्वन्द्धर्मस्थे वैरहद्रोगवन्ये ऽप्युच्छियेद् वैश्वदेवीक्रियाद्यः ॥
जिसके जन्मति से सप्तम मा अष्टम गृहगत शनि हो, वह मार्ग में गमन करता है तथा खी, पुत्र से हीन और दीन चेष्टा से गुत होता है। नवम राशिगत शनि हो तो पूर्ववत् फल होता है तथा द्वेष और हृदय के रोग से उसका वैश्वदेवो क्रिया आदि धर्म नष्ट होता है। यह वैखदेवी छन्द है गच्छति।
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