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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 51
आर्याणामपि कुरुते विनाशमन्तर्गुरुर्विषमसंस्थः । गण इव षष्ठे दृष्टः स सर्वलगुतां जनं नयति ॥
जिस तरह विषम गण में स्थित अन्तर्गुरु वाला (मध्य गुरु बाला जगण ) आर्या छन्द का और विषम स्थित (अप्रसत्र) गण (देवताविशेष) उत्तम पुरुषों का भी नारा करता है, उसी तरह विषम स्थित गुरु राशि के मध्य भाग में उत्तम पुरुषों का भी नारा करता है तथा जैसे आर्या छन्द के षष्ठ गण में स्थित जगण सर्वतपुत्व (चारो लघुता ) को प्राप्त होता है, उसी तरह पप्त राशिस्य गुरु जन को सर्वलघुत्व (लोगों में गौरवहीन) करता है। यह आर्या छन्द है।
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