रक्तैः पुष्पैर्गन्यैस्ताप्रैः कनक कनकवृषबकुलकुसुमैर्दिवाकर भूसुतौ भक्त्या पूज्याविन्दुर्धेन्वा सितकुसुमर- जतमधुरैः सितश्च मदनदैः । कृष्णद्रव्यैः सौरिः सौम्यो मणिरजत- तिलककुसुमैर्गुरुः परिपीतकैः प्रीतैः पीडा न स्यादुच्चाद्यदि पतति विशति यदि वा भुजङ्गविजृम्मितम् ॥
रक्तपुष्प, सुगन्ध द्रव्य, समालम्भन (रक्तचन्दन आदि), ताम्बा, सोना और बैल से सूर्य तथा मंगल की; घेनु, सफेद पुष्प, चाँदी और मिष्टान से चन्द्र की; कामोद्दीपक द्रव्य ( गन्ध, पुष्प, धूप और बलि) से शुक्र की; काले द्रव्यों से शनि की; मणि, चाँदी और तिल-पुष्प से बुध की एवं पीले द्रव्यों (पुष्प, सुगन्ध द्रव्य और उपहारों) से बृहस्पति की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। यदि ऊँचे स्थान से गिरे या क्रीड़ासक्त सर्पों में प्रवेश करे तो भो इस प्रकार पूजा से परितुष्ट ग्रहों के द्वारा पीड़ा नहीं होती है। यह भुजङ्गविजृम्भित छन्द है।
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