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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 1
प्रायेण सूत्रेण विनाकृतानि प्रकाशरन्ध्राणि चिरन्तनानि । रत्नानि शास्त्राणि च योजितानि नवैर्गुणैर्भूषयितुं क्षमाणि ॥
जिस प्रकार धागों से वर्जित, प्रकटित छिद्र वाले पुरातन रत्न नवीन धागों से योजित करने पर बहुधा भूषित करने के लिये समर्थ होते हैं, उसी प्रकार सूत्र (अक्षररचनारूप वृत्तवन्ध ) से वर्जित, प्रकटित दोष वाले, पुरातन, नवीन गुणों (सुन्दर वस्तु द्रव्य, वृत्तबन्धों) से योजित शाख भी भूषित करने के लिये समर्थ होते हैं।
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