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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 9
दैन्यं व्याधिं शुचमपि शशी पञ्चमे मार्गविनं षष्ठेवित्तं जनयति सुखं शत्रुरोगक्षयं च । यानं मानं शयनमशनं सप्तमे वित्तलाभं मन्दाक्रान्ते फणिनि हिमगौ चाष्टमे भीनं कस्य ॥
यदि चन्द्रमा जन्मराशि से पञ्श्चम राशि में हो तो दौनता, रोग, शोक और मार्ग में विघ्न करता है। षष्ठ में हो तो धन और सुख को उत्पत्र तथा शत्रु और रोग का नास करता है। सप्तम में हो तो वाहन, पूजा, शय्या, भोजन और धन को करता है। अष्टम रासि में हो तो विना प्रयत्न ग्रहण किया हुआ सर्प किसको भय नहीं करता है? अर्थात् सबको भय करता है, उसी तरह अष्टमस्थित चन्द्र भी सबको भय करता है। यह मन्दाक्रान्ता छन्द है।
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