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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 35
जनयति शुक्रः पञ्चमसंस्थो गुरुपरितोषं बन्धुजनाप्तिम्। मित्रसहायाननवसितत्वं सुतधनलब्धिं चारिबलेषु ॥
पञ्चम राशिगत शुक्र अधिक सन्तोष, बन्धुओं की प्राप्ति, पुत्र और धन का लाथ तथा शत्रु के सैन्यों में अनवस्थिति करता है। यह अनवसिता छन्द है।
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