सुरगुरुदिवसे कनकं रजतं तुरगाः करिणो वृषभा भिषगौषधयः । द्विजपितृसुरकार्यपुरः स्थितघर्म- निवारणचामर भूषणभूपतयः विबुधभवनधर्मसमाश्रयमङ्गल-
शास्त्रमनोज्ञबलप्रदसत्यगिरः व्रतहवनधनानि च सिद्धिकराणि तथा रुचिराणि च वर्णकदण्डकवत् ॥
बृहस्पति दिन में सोना, चाँदी, घोड़ा, हाथी, बैल, वैद्य, औषधि, ब्राह्मणों का तर्पण, पितृश्राद्ध, देवताओं का कार्य, पुरःस्थित (पदाति), छत्र, चामर, भूषण, राजा, देवगृह, देवप्रतिष्ठा, गृहप्रतिष्ठा, धर्माश्रय, मंगल, शास्त्र, सुन्दर, बलप्रद, सत्य वचन, व्रत ( चान्द्रायण आदि), हवन, धन-इन सभी वस्तुओं से सम्बन्धित कार्य वर्णक (सर्प आदि) से युत मनोहर दण्ड की तरह सिद्ध और सुन्दर होते हैं। यह वर्णकदण्डक छन्द है।
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