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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 15
रिपुभयकलहैर्विवर्जितः सकनकविद्रुमताम्रकामगः । रिपुभवनगते महीसुते किमपरवक्त्रविकारमीक्षते ॥
जन्मराशि से षष्ठ स्थान में मंगल हो तो शत्रुभय और कलह से रहित, सुवर्ण, प्रवाल और ताम्बे का लाभ होता है तथा उसको दूसरे मनुष्य का मुखविकार कभी नहीं देखना पड़ता। यह अपरवक्त्रा छन्द है।
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