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बृहत्संहिता • अध्याय 104 • श्लोक 56
यादृशेन प्रहेणेन्दुर्युक्तस्तादृग्भवेत् सोऽपि । मनोवृत्तिसमायोगाद्विकार इव वक्त्रस्य ॥
जिस तरह मनोवृत्ति के संयोग से मुख का विकार मनोवृत्ति के समान होता है, अर्थात् प्रसत्र पन रहने से प्ररात्र मुख और दुःखित मन रहने से उदास मुख रहता है, उसी तरह यादृद्म शुभाशुभ ग्रह से युक्क चन्द्र होता है, तादृश शुभाशुभ फल करता है। अर्थात् शुभ ग्रह से सुत चन्द्र शुभ फल और पापग्रह से युत चन्द्र पापफल करता है। यह चक्र छन्द है।
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