मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 5 — पञ्चमोल्लासः

कुलार्णव
87 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! आधारपात्रों और मांसों के लक्षण तथा कुलद्रव्य के निर्माण एवं उनके भेदों तथा माहात्म्य को कहिए। अविधि से किए गए कर्म का जो पाप होता है और सविधि से कृत कर्म का जो फल मिलता है, हे करुणानिधे! मैं वह सब सुनना चाहती हूँ कृपा कर उसे कहिए।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने पूछा है, उसे मैं कहूँगा। उसके सुनने मात्र से साधक देवताओं के समान होता है।
बिना आधार पात्र के कर्म अंश माना जाता है, जिससे योगिनी आदि माताएँ तृप्त नहीं होतीं। अतः कुलनायिके! विधिवत् आधार पात्र की रचना कर लेनी चाहिए।
हे देवि ! आधार पात्र त्रिपद कहा गया है, अथवा चतुष्पद, षट्पद या वर्तुलाकार सुन्दर बनवाना चाहिए। विद्वान् साधक स्वर्ण, चाँदी, पत्थर, कूर्म, कपाल, लौकी, मिट्टी, नारिकल, शङ्ख, ताम्र, मुक्ता, सीप या पवित्र वृक्षों की लकड़ी के पात्र बनाये। पात्र बहुत बड़ा या बहुत छोटा अथवा टूटा फूटा न ले।
स्वर्ण, रौप्य (चाँदी) और ताम्र के पात्र सभी सिद्धियों के देने वाले हैं। शान्तिकर्म में पत्थर का पात्र, स्तम्भन में मिट्टी का, वश्य में नारिकेल का और अभिचार में कूर्म का पात्र प्रशस्त है। शङ्ख पात्र ज्ञानप्रदायक है और शुक्ति (सीप) के पात्र से देवी की प्रसन्नता होती है। कपाल, आलावु और पवित्र वृक्षों की लकड़ी के पात्र योगसिद्धि प्रदान करने वाले और सब पापों का हरण करने वाले होते हैं। हे देवेशि! इनमें से किसी एक पात्र की रचना करे।
हे देवि! अब मैं कुलद्रव्यों को कहता हूँ, सावधान होकर सुनिए। बारह प्रस्थ पानी, आधा प्रस्थ तक्र, चार प्रस्थ भात, दो प्रस्थ मक्खन - इन सभी को एक घड़े में रखकर एक मुट्ठी घास के साथ रख दे।
शीतलता रहित स्थान पर दो दिन के लिए उसे स्थापित करना चाहिए। फिर अग्नि पर उसे चढ़ाकर तब तक पकावे जब तक सभी एक में मिलकर गाढ़ा हलुआ न बन जाए।
फिर इसे अग्नि से हटाकर ठण्डा करने के लिए छोड़ दे। फिर विद्वान् साधक एक प्रस्थ (अंजुलि) का चौथाई हाथों से मिलावे।
आधी अंजुली भात को इसमें मिलाकर एक दिन के लिए छोड़ दे। इसके बाद सम्यक् रूप से इसे मर्दित कर तक्र के साथ पाक को आलोडित कर मिलावे। यह 'पिष्टी' नाम से प्रसिद्ध है और यह देवता और दानवों दोनों द्वारा पूजित है।
हे कुलेशानि! फिर गौड़ी (नामक मद्य के लिए) श्वेत बर्बुर-जम्बु की छाल को पानी से धोकर और धातकी के फूल दोनों को दस अंजुलि लेना चाहिए।
इसके बाद नारियल के फूल को एक प्रस्थ इसमें मिलावे। फिर हरें और अक्षफल (बहेड़ा) को आठ निष्क मात्रा में इसमें मिला दे। फिर वहिन ( = नीबू) और त्रिकटु (मरिच, पीपर, सोंठ) अलग (एक निष्क) से मिला दे। एक मिट्टी के घड़े में ८० गुड़ के साथ सभी को एक में मिला दे।
फिर हाथों से सभी द्रव्यों को उलट फेरकर एक साथ फैंट दे। यह आलोडन विलोडन प्रत्येक दिन तीनों सन्ध्याओं में करके फेंटने की १०८ आवृत्ति पूर्ण करे। बारह दिन में यह पाक तैयार हो जाता है। तेरहवें दिन इसे छान कर रख ले। शिव-सायुज्य को प्राप्त कराने वाली इस मदिरा को 'गौड़ी' कहा जाता है।
माध्वी-शहद और इस शहद का दुगुना पानी एक घड़े में रख ले। बारह दिन में पूर्वोक्त क्रिया के सदृश इसका भी पाक हो जाता है। देवताओं को भी प्रिय लगने वाली इस मदिरा को 'माध्वी' कहा गया है।
एक भाग शुण्ठी, दो भाग वहिन (चित्रक), मरिच तीन भाग, धातकी चार भाग, फूल पाँच भाग और छः भाग मधु, अस्सी भाग गुड़ को पहले की भाँति एक में मिलावे। शेष सभी विधि पहले की तरह होती है। यह मनोहर द्रव्य योगिनियों के लिए उत्तम पेय है।
आधा तोला दही, एक प्रस्थ भैंस का मक्खन एवं सौ कच्चे केले - इन सभी को मिलाकर अत्यन्त मधुर मदिरा बनती है। इन सभी को एक में मिलाकर मोटे बाँस के खोह में रख दे। फिर उस बाँस के टुकड़े को ४८ दिन के लिए कमल के फूलों से भरे हुए तालाब में पकने के लिए गाड़ दे। फिर उसे निकाल कर सूर्य के प्रकाश में सूखने के लिए रख दे। जब यह कठोरता को प्राप्त करे तब इसे साधक लेकर गुञ्जाफल के प्रमाण में यथेच्छ जल में मिलाकर पीने से परमानन्द देता है। हे प्रिये। यह पेय सभी देवों को अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार ये मुख्य मदिरा हैं जिन्हें आपस में मिलाकर और भी अन्य प्रकार की मदिरा बनाई जा सकती है।
१. पानस, २. द्राक्ष, ३. माधूक, ४. खार्जूर, ५. ताल, ६. ऐक्षव, ७. मधु, ८. उच्छिष्ट, ९. माध्वीक, १०. मैरेय और ११. नारिकेल - ये ग्यारह मद्य भुक्ति व मुक्ति के देने वाले हैं।
हे प्रिये! बारहवाँ मद्य 'सुरा' है, जो सबसे उत्तम है। 'सुरा' तीन प्रकार की है - १. पैष्टी, २. गौड़ी और ३. माध्वी। पैष्टी सब सिद्धियों को देने वाली, गौड़ी भोगप्रदा और माध्वी मुक्तिकारिणी है। ये तीनों 'सुरा' देवताओं को प्रिय है।
ऐक्षवी विद्याप्रदा, द्राक्षी राज्यदायिनी है। तालजा स्तम्भन में प्रशस्त है और खार्जुरी शत्रुनाशिनी है। नारिकेल की बनी सुरा लक्ष्मीदायिनी और पानसी शुभकारिणी है। मधूक की बनी ज्ञानदायिनी और माध्वी रोगनाशिनी है। हे कुलेशानि! मैरेय सर्वपापहारिणी होती है।
क्षीर वृक्ष से बना मद्य, छाल वाले पेड़ से बना मद्य, मधूक (महुवा) के पुष्प से बना मद्य अन्य प्रकार के मद्य है।
जिस मद्य के पीने से विकाररहित और मन को प्रसन्नता होती है, हे देवि! ऐसा मद्य सदैव देवताओं को प्रिय होता है।
ऐसे मद्य से इच्छानुसार अपने पात्र को पूर्ण करे, जिससे परमानन्द की वृद्धि हो। हे प्रिये! यह आनन्ददायक द्रव्य सभी देवों को प्रिय है।
सुरा को देखने मात्र से सब पापों से छुटकारा मिलता है। उसकी गन्ध को सूंघने मात्र से सौ यज्ञों का फल मिलता है। मद्य के स्पर्श मात्र से कोटि तीर्थों का पुण्य मिलता है। हे देवि! उसे पीने से चारों प्रकार की मुक्ति साक्षात् ही प्राप्त होती है।
सुरा की गन्ध में इच्छाशक्ति होती है, उसके रस में क्रियाशक्ति, उसके स्वाद में ज्ञानशक्ति और उसके उल्लास में पराशक्ति अवस्थित होती हैं।
'सुरा' सेवन की विधि - मदिरा ब्रह्म की ओर ले जाने वाली और चित्त का शोधन करने वाली कही गई है। अतः उपर्युक्त में से एक को लेकर पूजाकर्म का प्रारम्भ करना चाहिए।
मद्य, मांस और विजया अष्टगन्ध के साथ मर्दित कर साधक वटिका बना ले और मद्य के अभाव में इसी वटिका को जल में मिलाकर उससे तर्पण किया करे। (विमर्श - १. चन्दन, २. अगरु, ३. कर्पूर, ४. चीर, ५. कुङ्कुम, ६. रोचना, ७. जटामांसी ओर ८. कपि - ये अष्टगन्ध कहे गए हैं।)
अथवा गुड़ मिले दही से अथवा मधुयुक्त सौ वीर से कर्म करे। किन्तु क्रिया का लोप कदापि न करे। प्रमादवश यदि क्रिया का लोप हुआ, तो साधक को देवता का शाप लगता है।
हे प्रिये! मांस तीन प्रकार का कहा गया है - १. खेचर का, २. भूचर का और ३. जलचर का मांस। तर्पण के लिए इन्हीं में से एक की यथासम्भव कल्पना करे। मांस के देखने का वही फल होता है, जो सुरा दर्शन का बताया गया है।
पितर एवं देवता के यज्ञों में वैध हिंसा की विधि है। हे प्रिये! जो कुछ भी हो अपने लिए प्राणियों की हिंसा कभी न करे।
निमित्त के बिना तिनके का भी छेदन कभी नहीं करना चाहिए। देवता या द्विज के लिए हिंसा करने से पाप नहीं लगता।
मेरा अनादर कर जो पुण्य भी किया जाता है, वह पाप ही होता है और मेरे निमित्त किया गया पाप, हे शाम्भवि! पुण्य में बदल जाता है ।
जिन पदार्थों से पतन ही होता है, उन्हीं के द्वारा सिद्धि भी मिलती है। श्रीकौलदर्शन और महान् भैरव के द्वारा इसी का विस्तार कहा गया है। मेरा कर्म करते रहने पर पर क्रिया का लोप नहीं होता क्योंकि सात करोड़ मुनि यही कर्म करते आये हैं।
हे प्रिये! गन्ध, पुष्पाक्षत से पशु की पूजा कर निम्न मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित कर उसकी बलि दे, अन्यथा साधक नरकगामी होता है।
मांस के जल में ब्रह्मा, गन्ध में विष्णु, रस में रुद्र और आनन्द में परमात्मा का वास है। अतः हे प्रिये! वह सेवनीय है।
मांस का अभाव होने पर लहसुन या अदरक से देवी की पूजा करे। अन्यथा पूजा निष्फल होती है।
मत्स्य और मांस से रहित केवल मद्य से तर्पण नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार मद्य से रहित केवल मत्स्य और मांस से पूजन नहीं करना चाहिए।
तिल मात्र ही मांस और केवल आधे तिल मात्र मद्यबिन्दु से एक बार भी तर्पण करने से करोड़ों यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
कुलपूजा के समान तीनों जगत् में कोई पुण्य नहीं है अतएव जो भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह भुक्ति और मुक्ति को प्राप्त करता है।
अनपढ़ और शास्त्र को न जानने वाला भी यदि गुरुभक्त और दृढव्रती होकर कुलपूजा में लगा रहता है, तो मुझे सबसे अधिक प्रिय होता है।
हे ईश्वरि! चारों वर्णों और आश्रमों के पुरुष, स्त्री, नपुंसक सभी के द्वारा पूजित होने पर आप अभीष्ट फल को प्रदान करती हैं।
हे देवेशि! पूजा किए जाने पर उत्तम वधू के समान इस लोक में और परलोक में आप शुभ फल देती हैं और पूजा न करने पर आप कुत्सित वधू के समान दुःख देती हैं।
कुलपूजा के बिना जो दुर्बुद्धि ऐसा करता है, वह इक्कीस पीढ़ियों के साथ घोर नरक में जाता है।
अतः सब प्रयत्न करके कुलपूजा में लगना चाहिए, जिससे सब सिद्धियाँ मिलती है, इसमें सन्देह नहीं।
कुलपूजा में यदि असमर्थ हो, तो कुल पूजन की सामग्री प्रदान करे। जो सामग्री न दे सकता हो, वह पूजन का दर्शन करे।
सौ यज्ञों को करने से जो फल मिलता है, वही फल केवल एक बार विधिपूर्वक कुलपूजा करने से प्राप्त होता है।
महान् सोलह दानों से जो फल मिलता है, वही फल श्री चक्र का दर्शन करने से मिलता है। साढ़े तीन कोटि तीर्थों में स्नान करने से जो फल मिलता है, वह एक बार विधि विधान से कुलपूजा करने से मिलता है।
अधिक कहने से क्या, हे देवि! जो यथाशक्ति कुलाचार्य को पूजा के लिए कुलद्रव्य देता है, वह धर्म का वास्तविक ज्ञाता है।
हे पार्वति! शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर, बौद्ध, पाशुपत, सांख्य, वैखानसव्रत, कालामुख, दक्षिण, वाम, सिद्धान्त अथवा वैदिक आदि सभी सम्प्रदायों में बिना मद्य मांस के पूजन करना निष्फल होता है।
कुलद्रव्यों के बिना जप, यज्ञ, तप, व्रत आदि करने से वह सब उसी प्रकार निष्फल होता है जिस प्रकार राख में किया गया हवन।
जिस प्रकार राजा को अन्तरङ्ग सेवक जितने प्रिय होते हैं, उतने बाह्य कर्मचारी नहीं, उसी प्रकार हे देवि! आपको अन्तर्याग करने वाले जितने प्रिय हैं, उतने अन्य नहीं।
हे देवि! जो भक्ति के साथ हम दोनों को मांस और आसव अर्पित कर अन्तर्याग में तत्पर होकर आनन्द का उद्भव करते है, वे कौलिक हम दोनों ही के सच्चिदानन्द लक्षण से युक्त परम स्वरूप वाले होते हैं। क्योंकि कुलद्रव्य उपभोग से उस आनन्द का परिस्फुरण होता है।
हे प्रिये! अन्तःस्थित उल्लास का अनुभव मन और वाणी से परे है। वह कुलद्रव्य के ही उपभोग से परिस्फुरित होता है, अन्य किसी उपाय से नहीं।
कुलद्रव्य का सेवन करने से कुलतत्त्व का अर्थ ज्ञात होता है और भैरवावेश का उद्रेक होकर साधक सर्वत्र समदर्शी होता है।
जिस प्रकार दीपक द्वारा अँधेरा घर दिखाई देता है, उसी प्रकार द्रव्यपान द्वारा माया से ढकी हुई आत्मा दिखाई पड़ती है।
मन्त्र द्वारा पवित्र और गुरुदेव एवं देवता को अर्पित कुलद्रव्य जो पीते हैं हे प्रिये! उन्हें स्तनपान नहीं करना पड़ता अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता।
'मद्य' भैरव देवस्वरूप है और 'मद्य' शक्तिरूप है। ओह! 'मद्य' का भोक्ता देवताओं को भी मुग्ध करता है।
हे प्रिये! उस मैरेय (= मद्य) का पान कर जो विकृत नहीं होता और मेरे ध्यान में एकाग्र हो जाता है, वह मुक्त होता है और वही कौलिक है।
'सुरा' शक्ति है और 'मांस' शिव। उन दोनों का भोक्ता साक्षात् भैरव है। उन दोनों के ऐक्य से उत्पन्न होने वाला आनन्द 'मोक्ष' कहलाता है।
आनन्द ब्रह्म का रूप है और वह देह में स्थित है। उसे अभिव्यञ्जित (व्यक्त) करने वाला मद्य है। इसी से योगी उसका पान करते हैं।
मद्य से पूर्ण कमण्डलू, शङ्ख एवं कपाल को धारण करने वाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर को यह संसार क्या नहीं देखता।
वीर साधक निःशङ्क, निर्भय, निःसङ्कोच और वेद शास्त्रार्थों से समर्थित होकर वर देने वाली वारुणी का पान करता है।
इस प्रकार मन्त्रसंस्कार से संशोधित अमृतपान के द्वारा, हे पार्वति! संसारबन्धन से छुड़ाने वाला देवताभाव जाग्रत् होता है।
ब्राह्मण के लिए यह अमृत सदा पेय है, क्षत्रिय के लिये युद्ध के आसन्न होने पर, वैश्य के लिये यज्ञ के अवसर पर और शूद्र के लिये श्रमसाध्य कार्य होने पर यह पेय है।
देवताओं और पितरों की पूजाकर गुरुदेव का स्मरण करते हुये शास्त्रोक्त विधि से मद्यपान और मांस भोजन करने से कोई दोष नहीं होता।
पितरों और देवताओं की तृप्ति के लिये और ब्रह्मतत्त्व में ध्यान स्थिर करने के लिये मधुमांस को सेवन करे। यदि कोई तृष्णा के वश होकर इनका सेवन करता है, तो वह पापी होता है।
मन्त्रार्थ के स्फुरण और मन की स्थिरता के लिये तथा संसार के बन्धन से मुक्ति पाने के लिये ज्ञानपूर्वक मधु (खेचर मुद्रा से प्राप्त सुधा का) पान करना चाहिये।
जो केवल अपने सुख के लिये मद्यादि का सेवन करता है, वह पापी होता है। स्वेच्छा से रहित होकर देवता की प्रसन्नता के लिये मत्स्य, मांस, सुरा आदि मादकों का सेवन करना चाहिये।
हे प्रिये! यागकाल के सिवा अन्य समयों में मद्यादि का सेवन करने से दोष होता है। जिस प्रकार यज्ञों में विप्रों के लिये सोमपान की विधि है, उसी प्रकार पूजा के समय इनका सेवन भोग और मोक्षप्रदायक है।
श्रीगुरुदेव से कुलशास्त्रों की भावना को अच्छी तरह समझकर पञ्चमुद्राओं (मद्य, मांस, मत्स्य, मैथुन, और मुद्रा) का सेवन करना चाहिये, अन्यथा साधक का पतन होता है।
गुरुपंक्ति और बटुक आदि का पूजन किये बिना यदि वीर साधक भी वृथा पान करता है, तो वह देवता के शाप को प्राप्त करता है।
भैरव की पूजा किये बिना और देवता का तर्पण किये बिना जो पशु विधि से पान करता है, वह वीर साधक भी नरक में जाता है।
कौलिक आचार को बिना जाने और गुरुपादुका का अर्चन किये बिना जो इस शास्त्र में प्रवेश करता है, उसे आप निश्चय ही दुःख देती हैं।
कौलज्ञान को हृदयङ्गम किये बिना जो द्रव्यों का भोग करना चाहता है, वह महापापी माना जाता है और सभी धर्मों से उसका बहिष्कार होता है।
समयाचार से हीन, स्वेच्छाचारी दुरात्मा को सिद्धियाँ न मिल कर वह कुल से पतित होता है। उसकी सङ्गत नहीं करनी चाहिये।
जो शास्त्र की विधि को छोड़कर मनमाने ढंग से व्यवहार करता है, वह इस संसार में सिद्धि नहीं पाता और नरक में जाता है।
दीक्षा संस्कार से रहित जो स्वेच्छा से रमण करता है, उसकी कोई सद्गति तप, तीर्थ, व्रत आदि द्वारा नहीं होती।
जो असंस्कृत द्रव्य को पीता है, अपने स्वाद के लिये मांस खाता है और बलात्कार करता है, वह भयङ्कर नरक में जाता है।
जो कौल साधक पशुव्रतों को मानते हैं, वे दोनों पक्षों की विडम्बना करते हैं और शरीर में जितने केश हैं, उतने काल तक रौरव नरक में रहते हैं।
जो दूसरे दर्शन को मानते हुये कुलद्रव्यों का सेवन करते हैं, वे अपने शरीर के केशों के समान काल तक भूतयोनियों में जन्म लेते हैं।
मद्यपान से जिसकी आत्मा ढकीं हुई है, वह ध्यान, तप, पूजा, धर्म, सत्कर्म, देवता, गुरु, आत्मा का कुछ भी ज्ञान नहीं रखता, वह कौलिक नहीं है, केवल विध्यभोग में आसक्त है। उसका पतन ही होता है, इसमें सन्देह नहीं
कौलोपदेश एवं पूजा से हीन व्यक्ति यदि मद्य, मांस और स्त्री में आसक्त होता है, तो वह अक्षय नरक को प्राप्त होता है।
हे कुलेशि! ब्रह्मनिष्ठ भी बिना संस्कार के पञ्चमुद्रा का सेवन करने से निन्दनीय होता है।
अतः लिङ्गत्रय का जानने वाला और षट्चक्रों का भेदक योगी पीठस्थानों में आकर महापद्म वन में विचरण करे।
मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक बारम्बार जाकर चिच्चन्द्रकुण्डलीशक्ति के सामरस्य से उत्पन्न सुख को अनुभव करते हुये व्योमपङ्कज से निकलती हुई सुधा को पान करना ही 'सुधापान' है। अन्य तो केवल (लौकिक) मद्य पाने वाले हैं।
पुण्य और पाप रूपी पशु को ज्ञानरूपी खड्ग से मारकर अपने चित्त को जो परतत्त्व में लय करता है, है देवि! वही मांसभक्षण करने वाला कहा जाता है। अपने मन द्वारा इन्द्रियों को नियन्त्रित कर आत्मा में लगाने वाला ही मत्स्य खाने वाला है। हे देवि! शेष तो प्राणियों के हिंसक मात्र हैं।
पशुभाव वाले व्यक्ति की शक्ति सोई हुई रहती है। कौल साधक की शक्ति जाग्रत् रहती है। उस शक्ति का जो सेवन करता है, वही शक्ति का सेवक है। जो पराशक्ति और अपनी आत्मा के संयोग से होने वाले आनन्द को अनुभव करता है, वही मैथुन का मर्मज्ञ है। अन्य लोग स्त्रीसेवी मात्र हैं।
इस प्रकार गुरुमुख से पाँचों मुद्राओं की भावना को जानकर जो साधक साधना करता है, हे देवि! वह मुक्त होता है।
हे देवि! कुलद्रव्य आदि का लक्षण मैंने संक्षेप में आपसे कहा है। अब आप और क्या सुनना चाहती हैं?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें