अध्याय 5 — पञ्चमोल्लासः
कुलार्णव
87 श्लोक • केवल अनुवाद
हे देवि ! आधार पात्र त्रिपद कहा गया है, अथवा चतुष्पद, षट्पद या वर्तुलाकार सुन्दर बनवाना चाहिए। विद्वान् साधक स्वर्ण, चाँदी, पत्थर, कूर्म, कपाल, लौकी, मिट्टी, नारिकल, शङ्ख, ताम्र, मुक्ता, सीप या पवित्र वृक्षों की लकड़ी के पात्र बनाये। पात्र बहुत बड़ा या बहुत छोटा अथवा टूटा फूटा न ले।
हे पार्वति! शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर, बौद्ध, पाशुपत, सांख्य, वैखानसव्रत, कालामुख, दक्षिण, वाम, सिद्धान्त अथवा वैदिक आदि सभी सम्प्रदायों में बिना मद्य मांस के पूजन करना निष्फल होता है।
मद्यपान से जिसकी आत्मा ढकीं हुई है, वह ध्यान, तप, पूजा, धर्म, सत्कर्म, देवता, गुरु, आत्मा का कुछ भी ज्ञान नहीं रखता, वह कौलिक नहीं है, केवल विध्यभोग में आसक्त है। उसका पतन ही होता है, इसमें सन्देह नहीं