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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 33
शिवोत्कृत्तमिदं पिण्डमतस्त्वं शिवतां गतः । तद् बुध्यस्य पशो त्वं हि मा शिवस्त्वं शिवोऽसि हि ॥ ब्रह्मा स्यात् पलले विष्णुर्गन्धे रुद्रश्च तद्रसे । परमात्मा तदानन्दे तस्मात् सेव्यमिदं प्रिये ॥
मांस के जल में ब्रह्मा, गन्ध में विष्णु, रस में रुद्र और आनन्द में परमात्मा का वास है। अतः हे प्रिये! वह सेवनीय है।
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