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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 4
आधारं त्रिपदं प्राहुः षट्पदं वा चतुष्पदम् । अथवा वर्तुलाकारं कुर्याद्दवि मनोहरम् ॥ स्वर्णरौप्यशिलाकूर्मकपालालाबुमृण्मयम् । नारिकेलशङ्खताप्रमुक्ताशुक्तिसमुद्भवम् ॥ पुण्यवृक्ष समुद्भूतं पात्रं कुर्याद्विचक्षणः । अतिसूक्ष्ममतिस्थूलं छिन्नं भिन्नञ्च वर्जयेत् ॥
हे देवि ! आधार पात्र त्रिपद कहा गया है, अथवा चतुष्पद, षट्पद या वर्तुलाकार सुन्दर बनवाना चाहिए। विद्वान् साधक स्वर्ण, चाँदी, पत्थर, कूर्म, कपाल, लौकी, मिट्टी, नारिकल, शङ्ख, ताम्र, मुक्ता, सीप या पवित्र वृक्षों की लकड़ी के पात्र बनाये। पात्र बहुत बड़ा या बहुत छोटा अथवा टूटा फूटा न ले।
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