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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 85
अप्रबुद्धा पशोः शक्तिः प्रबुद्धा कौलिकस्य च । शक्तिं तां सेवयेत् यस्तु स भवेत् शक्तिसेवकः ॥ पराशक्त्यात्ममिथुनसंयोगानन्दनिर्भरः । य आस्ते मैथुनं तत् स्यादपरे स्त्रीनिषेवकाः ॥
पशुभाव वाले व्यक्ति की शक्ति सोई हुई रहती है। कौल साधक की शक्ति जाग्रत् रहती है। उस शक्ति का जो सेवन करता है, वही शक्ति का सेवक है। जो पराशक्ति और अपनी आत्मा के संयोग से होने वाले आनन्द को अनुभव करता है, वही मैथुन का मर्मज्ञ है। अन्य लोग स्त्रीसेवी मात्र हैं।
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