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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 15
सार्द्धन्दुपलकं दघ्नो माहिषं प्रस्थमात्रकम् । मोचापक्वशतञ्चापि योगोऽयं मदिरा शुभा ॥ तं मेलयित्वा संयोज्य सान्द्रे वंशपुटे पचेत् । चत्वारिंशद्दिनान्यष्टौ पङ्के पङ्कजसम्भवे ॥ निधायोद्धृत्य किरणैः सौरैः सम्यग् विशोषयेत् । यदा च कठिनीभावस्तदा संगृह्य मानवः ॥ गुञ्जाफलप्रमाणन्तु जलैः सम्मिलितं शुभम् । आत्मेच्छं पूरयेत् पात्रं परमानन्ददं परम् ॥ एतादप्युत्तमं द्रव्यं सर्वदेवप्रियं प्रिये । एतानि मदहेतूनि मद्यान्यन्यानि कारयेत् ॥
आधा तोला दही, एक प्रस्थ भैंस का मक्खन एवं सौ कच्चे केले - इन सभी को मिलाकर अत्यन्त मधुर मदिरा बनती है। इन सभी को एक में मिलाकर मोटे बाँस के खोह में रख दे। फिर उस बाँस के टुकड़े को ४८ दिन के लिए कमल के फूलों से भरे हुए तालाब में पकने के लिए गाड़ दे। फिर उसे निकाल कर सूर्य के प्रकाश में सूखने के लिए रख दे। जब यह कठोरता को प्राप्त करे तब इसे साधक लेकर गुञ्जाफल के प्रमाण में यथेच्छ जल में मिलाकर पीने से परमानन्द देता है। हे प्रिये। यह पेय सभी देवों को अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार ये मुख्य मदिरा हैं जिन्हें आपस में मिलाकर और भी अन्य प्रकार की मदिरा बनाई जा सकती है।
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