आधारेण विना भ्रंशो न च तृप्यन्ति मातरः ।
तस्माद्विधिवदाधारं कल्पयेत् कुलनायिके ॥
बिना आधार पात्र के कर्म अंश माना जाता है, जिससे योगिनी आदि माताएँ तृप्त नहीं होतीं। अतः कुलनायिके! विधिवत् आधार पात्र की रचना कर लेनी चाहिए।
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