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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 14
एका शुण्ठी द्विवह्निश्च मरीचत्रितयं तथा । धातकी च चतुष्कं स्यात् पञ्च पुष्पाणि षण्मधु ॥ अशीतिगुडसम्मिश्र शेषमन्यत् पुरोक्तवत् । इदं मनोहरं द्रव्यं योगिनीपानमुत्तमम् ॥
एक भाग शुण्ठी, दो भाग वहिन (चित्रक), मरिच तीन भाग, धातकी चार भाग, फूल पाँच भाग और छः भाग मधु, अस्सी भाग गुड़ को पहले की भाँति एक में मिलावे। शेष सभी विधि पहले की तरह होती है। यह मनोहर द्रव्य योगिनियों के लिए उत्तम पेय है।
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