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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 83
आमूलाधारमाब्रह्मरन्ध्र गत्वा पुनः पुनः । चिच्चन्द्रकुण्डलीशक्तिसामरस्य सुखोदयः ॥ व्योमपङ्कजनिस्यन्दसुधापानरतो नरः । सुधापानमिदं प्रोक्तमितरे मद्यपायिनः ॥
मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक बारम्बार जाकर चिच्चन्द्रकुण्डलीशक्ति के सामरस्य से उत्पन्न सुख को अनुभव करते हुये व्योमपङ्कज से निकलती हुई सुधा को पान करना ही 'सुधापान' है। अन्य तो केवल (लौकिक) मद्य पाने वाले हैं।
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