मदप्रच्छादितात्मा च न किञ्चिदपि वेत्ति च । न ध्यानं न तपो नार्चा न धर्मो न च सत्क्रिया ॥
न दैवं न गुरुर्नात्मविचारो न स कौलिकः । केवलं विषयासक्तः पतत्येव न संशयः ॥
मद्यपान से जिसकी आत्मा ढकीं हुई है, वह ध्यान, तप, पूजा, धर्म, सत्कर्म, देवता, गुरु, आत्मा का कुछ भी ज्ञान नहीं रखता, वह कौलिक नहीं है, केवल विध्यभोग में आसक्त है। उसका पतन ही होता है, इसमें सन्देह नहीं
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