तन्मैरेयं नरः पीत्वा यो न विकुरुते प्रिये ।
मद्द्यानैकपरो भूत्वा स मुक्तः स च कौलिकः ॥
हे प्रिये! उस मैरेय (= मद्य) का पान कर जो विकृत नहीं होता और मेरे ध्यान में एकाग्र हो जाता है, वह मुक्त होता है और वही कौलिक है।
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