यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ।
स सिद्धिमिह नाप्नोति परत्र न परां गतिम् ॥
जो शास्त्र की विधि को छोड़कर मनमाने ढंग से व्यवहार करता है, वह इस संसार में सिद्धि नहीं पाता और नरक में जाता है।
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