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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 6
कुलद्रव्यं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । अम्भसां द्वादशप्रस्थं प्रस्थाई तक्रमेव च ॥ तण्डुलानां चतुःप्रस्थं द्विप्रस्थञ्च तथान्धसाम् । मुष्टिमात्राङ्कुरैः सार्द्धम् एकस्मिन् योजयेद् घटे ॥
हे देवि! अब मैं कुलद्रव्यों को कहता हूँ, सावधान होकर सुनिए। बारह प्रस्थ पानी, आधा प्रस्थ तक्र, चार प्रस्थ भात, दो प्रस्थ मक्खन - इन सभी को एक घड़े में रखकर एक मुट्ठी घास के साथ रख दे।
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