यथैवान्तश्चरा राज्ञः प्रियाः स्युर्न बहिश्चराः ।
तथान्तर्यागनिष्ठा ये ते प्रिया देवि नापरे ॥
जिस प्रकार राजा को अन्तरङ्ग सेवक जितने प्रिय होते हैं, उतने बाह्य कर्मचारी नहीं, उसी प्रकार हे देवि! आपको अन्तर्याग करने वाले जितने प्रिय हैं, उतने अन्य नहीं।
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