गुडमिश्रेण तक्रेण तर्पयेत् मधुभाजिना ।
सौवीरेणाथवा कुयदितत् कर्म न लोपयेत् । प्रमादाद् यदि लुप्येत देवताशापमाप्नुयात् ॥
अथवा गुड़ मिले दही से अथवा मधुयुक्त सौ वीर से कर्म करे। किन्तु क्रिया का लोप कदापि न करे। प्रमादवश यदि क्रिया का लोप हुआ, तो साधक को देवता का शाप लगता है।
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