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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 44
सम्यक् शतक्रतून् कृत्वा यत् फलं समवाप्नुयात् । तत् फलं समवाप्नोति सकृत् कृत्वा क्रमार्चनम् ॥
सौ यज्ञों को करने से जो फल मिलता है, वही फल केवल एक बार विधिपूर्वक कुलपूजा करने से प्राप्त होता है।
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