समर्पयन्ति ये भक्त्या आवाभ्यां पिशितासवम् । उत्पादयन्ति चानन्दं मत्प्रियाः कौलिकाश्च ते ॥
आवयोः परमाकारं कुलद्रव्योपभोगेन सच्चिदानन्दलक्षणम् । परिस्फुरति नान्यथा ॥
हे देवि! जो भक्ति के साथ हम दोनों को मांस और आसव अर्पित कर अन्तर्याग में तत्पर होकर आनन्द का उद्भव करते है, वे कौलिक हम दोनों ही के सच्चिदानन्द लक्षण से युक्त परम स्वरूप वाले होते हैं। क्योंकि कुलद्रव्य उपभोग से उस आनन्द का परिस्फुरण होता है।
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