असंस्कारी तु यो नौ स्यात् पञ्च मुद्रा निषेवते ।
कुलेशि ब्रह्मनिष्ठोऽपि निन्द्यतामधिगच्छति ॥
हे कुलेशि! ब्रह्मनिष्ठ भी बिना संस्कार के पञ्चमुद्रा का सेवन करने से निन्दनीय होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।