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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 12
करेण भ्रामयेत् सम्यगनुलोमविलोमतः । अष्टोत्तरशतावृत्त्या त्रिसन्ध्यं प्रतिवासरम् ॥ द्वादशाहेन पाकः स्यात् पालयेत्तत्त्रयोदशे । एषा गौडीति कथिता शिवसायुज्यहेतुकी ॥
फिर हाथों से सभी द्रव्यों को उलट फेरकर एक साथ फैंट दे। यह आलोडन विलोडन प्रत्येक दिन तीनों सन्ध्याओं में करके फेंटने की १०८ आवृत्ति पूर्ण करे। बारह दिन में यह पाक तैयार हो जाता है। तेरहवें दिन इसे छान कर रख ले। शिव-सायुज्य को प्राप्त कराने वाली इस मदिरा को 'गौड़ी' कहा जाता है।
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