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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 84
पुण्यापुण्यपशुं हत्वा ज्ञानखड्गेन योगवित् । परे लयं नयेच्चितं पलाशी स निगद्यते ॥ मनसा चेन्द्रियगणं संयम्यात्मनि योजयेत् । मत्स्याशी स भवेद्देवि शेषाः स्युः प्राणिहिंसकाः ॥
पुण्य और पाप रूपी पशु को ज्ञानरूपी खड्ग से मारकर अपने चित्त को जो परतत्त्व में लय करता है, है देवि! वही मांसभक्षण करने वाला कहा जाता है। अपने मन द्वारा इन्द्रियों को नियन्त्रित कर आत्मा में लगाने वाला ही मत्स्य खाने वाला है। हे देवि! शेष तो प्राणियों के हिंसक मात्र हैं।
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