जिन पदार्थों से पतन ही होता है, उन्हीं के द्वारा सिद्धि भी मिलती है। श्रीकौलदर्शन और महान् भैरव के द्वारा इसी का विस्तार कहा गया है। मेरा कर्म करते रहने पर पर क्रिया का लोप नहीं होता क्योंकि सात करोड़ मुनि यही कर्म करते आये हैं।
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