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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 31
यैरेव पतनं द्रव्यैः सिद्धिस्तैरेव चोदिता । श्रीकौलदर्शन चापि भैरवेण महात्मना ॥ मत्कर्म कुर्वतां पुंसां कर्मलोपो भवेन्नहि (यदि) । तत्कर्म ते प्रकुर्वन्ति सप्तकोटिमुनीश्वराः ॥
जिन पदार्थों से पतन ही होता है, उन्हीं के द्वारा सिद्धि भी मिलती है। श्रीकौलदर्शन और महान् भैरव के द्वारा इसी का विस्तार कहा गया है। मेरा कर्म करते रहने पर पर क्रिया का लोप नहीं होता क्योंकि सात करोड़ मुनि यही कर्म करते आये हैं।
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