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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 66
सेवेत स्वसुखार्थं यो मद्यादीनि स पातकी । प्राशयेद्देवताप्रीत्यै स्वाभिलाषविवर्जितः ॥ मत्स्यमांससुरादीनां मादकानां निषेवणम् ।
जो केवल अपने सुख के लिये मद्यादि का सेवन करता है, वह पापी होता है। स्वेच्छा से रहित होकर देवता की प्रसन्नता के लिये मत्स्य, मांस, सुरा आदि मादकों का सेवन करना चाहिये।
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