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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 17
द्वादशन्तु सुरा मद्य सर्वेषामुत्तमं प्रिये ॥ पैष्टी गौडी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा । सर्वसिद्धिकरी पैष्टी गौडी भोगप्रदायिनी ॥ माध्वी मुक्तिकरी ज्ञेया सुरा स्याद्देवताप्रिया ।
हे प्रिये! बारहवाँ मद्य 'सुरा' है, जो सबसे उत्तम है। 'सुरा' तीन प्रकार की है - १. पैष्टी, २. गौड़ी और ३. माध्वी। पैष्टी सब सिद्धियों को देने वाली, गौड़ी भोगप्रदा और माध्वी मुक्तिकारिणी है। ये तीनों 'सुरा' देवताओं को प्रिय है।
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