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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 65
मन्त्रार्थं स्फुरणार्थाय मनसः स्थैर्यहेतवे । भवपाशनिवृत्त्यर्थं मधुपानं समाचरेत् ॥
मन्त्रार्थ के स्फुरण और मन की स्थिरता के लिये तथा संसार के बन्धन से मुक्ति पाने के लिये ज्ञानपूर्वक मधु (खेचर मुद्रा से प्राप्त सुधा का) पान करना चाहिये।
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