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कुलार्णव • अध्याय 5 • श्लोक 22
सुरादर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते । तद्गन्धाघ्राणमात्रेण शतक्रतुफलं लभेत् ॥ मद्यस्पर्शनमात्रेण तीर्थकोटिफलं लभेत् । देवि तत्पानतः साक्षाल्लभेन्मुक्तिं चतुर्विधाम् ॥
सुरा को देखने मात्र से सब पापों से छुटकारा मिलता है। उसकी गन्ध को सूंघने मात्र से सौ यज्ञों का फल मिलता है। मद्य के स्पर्श मात्र से कोटि तीर्थों का पुण्य मिलता है। हे देवि! उसे पीने से चारों प्रकार की मुक्ति साक्षात् ही प्राप्त होती है।
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