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अध्याय 13 — त्रयोदशोल्लासः

कुलार्णव
82 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! हे करुण रूप अमृत के समुद्र! हे देवेश! कृपा करके गुरु एवं शिष्य दोनों के लक्षणों को मुझे सुनना चाहिए अतः उन्हें कहिए।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने मुझसे पूछा है, उसे कहूँगा, जिसके सुनने मात्र से गुरुभक्ति उत्पन्न होती है।
हे प्रिये! दुष्ट वंश में उत्पन्न, गुणहीन, कुरूप, परशिष्य, पाखण्डी, नपुंसक, घमण्डी, अधिकाङ्ग, विकृताङ्ग, पंगु, अन्ध बधिर, मलिन, रोगी, उत्सृष्ट, दुर्मुख, मनमाने वस्त्र पहनने वाले, अङ्ग, चेष्ठ, गति, भाषण एवं वीक्षण से विचार प्रकट करने वाले, निद्रा, तन्द्रा एवं जड़तादि से युक्त, आलसी, धूतादि व्यसनी, सदैव द्वार, स्तम्भादि या दिवाल के पीछे छिपने वाले, अन्तर्भक्ति से युक्त किन्तु चन्दनादि बाह्य चिन्हों को न करने वाले, क्षुद्र, बाह्य भक्ति से हीन, मिथ्यावादी, स्तब्ध, शठ (चतुर), धन, स्त्री की शुद्धि से रहित, विधि निषेध को न मानने वाले व्यक्ति को शिष्य न बनाए।
हे देवि! रहस्य को ढूँढ़ने वाले, कार्य बिगाड़ने वाले, बिल्ली व बगुले के स्वभाव वाले, छिद्रान्वेषी, मायावी, कृतघ्न, गुप्त बात को प्रकट करने वाले, विश्वासघाती, स्वामिद्रोही, पापी, अविश्वासी, संशयालु, सिद्धिकांक्षी, आततायी, क्रोधी एवं झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति को शिष्य न बनाए।
हे देवि! ठगने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का अभिमान करने वाले, निष्ठुर, आसक्त, गँवार, बहुभाषी, दुष्टविचार वाले, कुतर्की, झगड़ालू, व्यर्थ आक्षेप करने वाले, मूर्ख, चञ्चल, बात बनाने वाले, सामने प्रिय और पीठ पीछे दोष कहने वाले, (अज्ञानी होकर भी) ब्राह्मण के समान बोलने वाले, विद्या (साहित्य) चुराने वाले, आत्म प्रशंसक, गुणों को न सहने वाले (जरतुहा), अपकार करने वाले, कष्ट में व्याकुल होने वाले, क्रोधपूर्ण, अत्यधिक बोलने वाले, दुर्जनों के साथ रहने वाले, सर्वलोकनिन्दित, चुगुलखोर, परसन्तापी, प्रणयभङ्ग करने वाले, अपने कष्ट को कहने वाले, अपने स्वामी से विश्वासघात करने वाले, आत्मवञ्चक, जिह्नोपस्थ में आसक्त, चोर, पशु चेष्टा वाले, अकारण द्वेष, हास, क्लेश एवं क्रोध करने वाले, दुस्साहसी, मार्मिक परिहास करने वाले, कामुक, निर्लज्ज, झूठे एवं पापपूर्ण कार्यों के लिए उत्तेजित करने वाले, असूया, मद, मात्सूर्य, दम्भ, अहङ्कार से युक्त, ईर्ष्या, पारुष्य, पैशुन्य, कृपणता एवं क्रोध से युक्त मनवाले, अधीर, दुखी, भीरु, अशक्त, व्याकुल, अविकसित बुद्धि, मन्दबुद्धि, मूढ़, चिन्ताकुल, तृष्णा, लोभ से युक्त, दीन, असन्तोषी, सबसे माँगने वाले, बहुभोजी, कपटी, भ्रम फैलाने वाले, कुटिल, भक्ति, श्रद्धा, दया, शान्ति और धर्माचार से हीन, माता, पिता गुरुप्राज्ञ के सद्वचनों की हँसी उड़ाने वाले, कुलद्रव्यों के प्रति वीभत्स, गुरुसेवा का अभिमान करने वाले, स्त्रीद्वेषी, समयाचार से भ्रष्ट, गुरु से शापित आदि- इस प्रकार के दुर्गुणयुक्त व्यक्ति को हे कुलेश्वरि! गुरु शिष्य न बनाये।
हे कुलेशानि! सच्छिष्य शुभ लक्षणों से युक्त होता है। समाधि साधनों से युक्त, गुणशील वाले, शुद्ध शरीर एवं वस्त्र वाले, प्राज्ञ, धार्मिक, शुद्धमन, दृढ़व्रती, सदाचारी, श्रद्धा भक्ति से युक्त, समर्थ अल्पभोजी, गूढ़चित्त, निःस्वार्थ सेवा करने वाले, विवेकी, वीर, दरिद्रता से रहित, मन वाले, सब कार्यों में कुशल, स्वच्छ, सर्वोपकारी, कृतज्ञ, पाप से डरने वाले, साधु सज्जन से सम्मत, आस्तिक, दानी, सब प्राणियों की भलाई करने वाले, विश्वास और नम्रता से युक्त, धन एवं देह के अवश्ञ्चक, असाध्य को सिद्ध करने वाले, शूर, उत्साह, बल से युक्त, अनुकूल कार्य करने वाले, अप्रमादी, बुद्धिमान्, प्रिय, सत्य, अल्प और सहर्ष बोलने वाले, दोषमुक्त, एक बार कहे को समझने वाले, चतुर, अपनी प्रशंसा और दूसरी की निन्दा से विमुख, सुमुख, जितेन्द्रिय, सन्तुष्ट, धीमान्, ब्रह्मचारी, आदि से रहित, आधि, व्याधि, चापल्य, दुःख, प्रान्ति व सन्देह से रहित शिष्य ग्राह्य है।
गुरु के ध्यान, स्तुति, कथा और देवता की पूजा बन्दना में उत्सुक, गुरु दैवत में समान भक्ति रखने वाले, कुल स्त्री पूजक, नित्य गुरु के समीप रहने बाले, गुरु को सन्तुष्ट करने वाले, मन, वचन, शरीर से नित्य सेवा में तत्पर, गुरु आज्ञा का पालन करने वाले, गुरु कीर्ति को फैलाने वाले, गुरु वाक्य को प्रमाण मानने वाले, गुरुसेवा में तत्पर, मनोनुकूल, सेवक के सामान गुरु का कार्य करने वाले, गुरु के समक्ष जाति, मान एवं धन में गर्व न करने वाले, गुरुद्रव्य से निरपेक्ष, गुरु प्रसाद के अभिलाषी, कुल धर्म कथा और योग-योगिनी कौलिकों को चाहने वाले, कुलपूजा में लगे हुए और कुल द्रव्य का गोपन करने वाले, जप व ध्यानादि में तत्पर, मोक्षमार्ग के अभिलाषी, कुलशास्त्र को मानने वाले और पशुशास्त्र से विमुख आदि- इस प्रकार के लक्षणों से युक्त व्यक्ति को शिष्य बनाए।
गुरु के लक्षण हे परमेशानि! शुद्धवेषधारी, मनोहर, सर्वलक्षण, सम्पन्न, सर्वाङ्गपूर्ण, सभी आगमों के तत्त्वार्थ के ज्ञाता, सभी मन्त्रों के विधान के ज्ञाता, लोक को सम्मोहित करने वाले, देवस्वरूप, प्रियदर्शन, सुमुख, सुलभ, स्वच्छ, भ्रम, संशयनाशक, इङ्गित और आकार के प्राज्ञ, ऊहापोह के विशेषज्ञ, अन्तर्मुखी होते हुये भी बहिदृष्टि रखने वाले सर्वश, देश-काल के ज्ञाता, आज्ञासिद्ध, त्रिकालज्ञ, निग्रह-अनुग्रह में समर्थ, बेधड़क, बोधक, शान्त, सभी जीवों पर दया करने वाले, जितेन्द्रिय, षड् वर्गों को जय करने में समर्थ, व्यक्ति को गुरु बनाना चाहिए।
अग्रगण्य, गम्भीर, पात्र-अपात्र के विशेषज्ञ, शिव एवं विष्णु के समान, साधु, पशुदर्शन के दोष बताने वाले, निर्मल, नित्यसन्तुष्ट, स्वतन्त्र, मन्त्र-शक्तिमान्, भक्तवत्सल, धीर, कृपालु, प्रसन्नमुख, भक्तप्रिय, सब शास्त्रों के ज्ञाता, शुभ, शिष्ट, अपने इष्टदेव और गुरुओं, ज्येष्ठों, वनिताओं के पूजन में उत्सुक रहने वाले व्यक्ति को गुरु बनाना चाहिए।
नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों में तत्पर रहने वाले, राग, द्वेष, भय, क्लेश, दम्भ, अहङ्कार से रहित, अपनी विद्या के अनुष्ठान में लगे हुये, तपोधर्म का प्रकाश करने वाले, यथाप्राप्त से सन्तुष्ट, गुण, दोष के विवेचक, स्त्री-धनादि में अनासक्त, दुःसङ्ग, व्यसनादि से रहित, सर्वाहंभाव से युक्त, निर्द्वन्द्व, व्रतपरायण, अलोलुप, अहिंसक, विद्वान्, धन विद्यादि द्वारा मन्व-यन्त्र तन्त्रादि को न बेचने वाले, निःसङ्ग, निर्विकल्प, अर्थ निर्णायक, अति धार्मिक, निन्दास्तुति मे समभाव रखने वाले, निरपेक्ष, नियम निर्देश करने वाले इत्यादि - है प्रिये! इस प्रकार के लक्षण से युक्त श्रीगुरु कहे गये हैं।
हे प्रिये! जो शिव सर्वव्यापी, सूक्ष्म, उन्मना, निष्कल, अव्यय, व्योमाकार, अजन्मा और अनन्त हैं, उनकी पूजा करना कैसे सम्भव है? हे देवि! इसी से शिव साक्षाद् गुरु रूप का आश्रय लेते हैं और भक्ति से सम्पूजित होकर भुक्ति एवं मुक्ति को प्रदान करते हैं।
हे देवि! मैं शिव हूँ। मेरी कोई आकृति नहीं है। मनुष्यों की दृष्टि में आने वाला मैं नहीं हूँ। इसलिये श्रीगुरुरूप से शिव धार्मिक शिष्यों की सदा रक्षा करते हैं। मनुष्य चर्म में साक्षात् परशिव स्वयं आबद्ध होते हैं और पृथ्वी पर गुप्तः रूप से सच्छिष्यों पर अनुग्रह करने के लिये भ्रमण करते हैं। सद्भक्तों की रक्षा के लिए ही निराकार भी आकृतियुक्त होता है। दयासागर शिव इस लोक में संसारी के समान चेष्टा करते हैं।
ललाट के लोचन, चन्द्रकला और दो भुजाओं को अन्तर्हित कर वे पृथ्वी पर गुरु रूप से विद्यमान रहते हैं।
श्री गुरुदेव का ब्रह्मा, विष्णु, शिवत्त्वरूप - हे प्रिये! शिव त्रिनेत्रहीन होकर, विष्णु चतुर्भुजाओं से हीन होकर और ब्रह्मा चतुर्मुखों से हीन होकर साक्षात् 'श्रीगुरु' कहलाते हैं। पाप कर्मों के कारण पापियों को श्रीगुरु मनुष्य के समान और पुण्य कर्मों के कारण पुण्यात्माओं को श्रीगुरु शिव के समान संसार में दिखाई देते हैं। आँखों के सामने श्रीगुरु परम तत्त्व स्वरूप विद्यमान है, किन्तु भाग्यहीन लोग उन्हें देख नहीं पाते, जैसे अन्धे उदय हुये सूर्य को नहीं देखते।
गुरु साक्षात् सदाशिव हैं, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। गुरु शिव ही न हो तो, तो भुक्ति और मुक्ति को कौन देता? भगवान् सदाशिव और श्री गुरु-इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है। जो उनमें अन्तर समझता है, वह पापी है। देशिक की आकृति को धारण कर पशु के समस्त पाशों को काट कर वे उसे परम पद को पहुँचाते हैं, अतः 'गुरु' कहलाते हैं। दयानिधि ईश्वर सब पर अनुग्रह करने के लिये 'आचार्य' का रूप धारण कर दीक्षा द्वारा पशुओं का मोक्ष करते हैं।
देवता, मन्त्र और गुरु में अभेद-जिस प्रकार घट, कलश और कुम्भइन तीनों शब्दों का एक ही अर्थ है, उसी प्रकार देवता, मन्त्र और गुरु एक ही अर्थ के वाचक बताए गये हैं।
जो देव है, वही मन्त्र है और जो मन्त्र है, वही गुरु है। अतः देवता, मन्त्र और गुरु की पूजा का समान फल होता है।
हे पार्वति! शिवरूप धारण कर मैं पूजा को स्वीकार करता हूँ, और गुरु रूप में होकर जीव को बन्धनों से मुक्त करता हूँ।
'सिद्धान्त का सार जानने वाला में बीज हूँ', इस प्रकार का बोध देने वाला सदा आनन्दित रहने बाला 'गुरु' कहलाता है।
आश्रमों और वर्णों का लंघन कर जो सदा आत्मा में स्थित रहता है और ज्योतिरूप वर्णाश्रम वाला योगी है, हे प्रिये! वह 'गुरु' कहा गया है।
हे प्रिये! छः आधारों और छः अध्वानों को जो विधिपूर्वक जानता है; दृश्य के बिना जिसकी दृष्टि स्थिर रहती है, आलम्बन के बिना जिसका मन स्थिर रहता है और श्रम किए बिना जिसका मन स्थिर रहता है तथा श्रम किए बिना जिसका प्राण (वायु) स्थिर रहता है; हे कुलनायिके! सम्बित्ति को प्रकट करने वाले और परानन्द के उद्भव करने वाले तत्त्व को जो जानता है; भूत, भविष्य, तन्त्र, मन्त्र, शाक्त, शाम्भव और छः प्रकार के वेधों को जो जानता है, हे देवि! वही 'वेध करने वाला गुरु' है।
१. पद, २. वर्ण (मन्त्र), ३. कला, ४. यन्त्र, ५. मण्डल (तत्त्व), ६. भुवन (गुण) - इन छः अध्वानों को जो शुद्ध करता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
१. बेध, २. घट (पद), ३. निरोध (विरोध), ४. ग्रहण, ५. मोक्षण - इन्हें जो भले प्रकार जानता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
१. जाग्रत्, २. स्वप्न, ३. सुषुप्ति, ४. तुरीय, ५. तुरीयातीत - इन पाँचों को हे देवि! जो जानता है, वह गुरु कहा गया है।
१. पिण्ड, २. पद, ३. रूप, ४. रूपातीत - इन चारों को जो भले प्रकार से जानता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
१. परा, २. पश्यन्ती, ३. मध्यमा, ४. वैखरी - इन चारों को जो जानता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
१. आत्म, २. विद्या, ३. शिव, ४. सर्व - इन चारों तत्त्वों को जो जानता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
पाशच्छेद (पशु स्तम्भ), २. वेध दीक्षा, ३. पशुमहण (पशुत्वहन) - इन तीन को जो जानता है वह श्रेष्ठ गुरु है।
पद और पशुओं के पाशों का रहस्यार्थ जो विधानतः जानता है, हे बरारोहे! हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
१. चक्रसङ्केत, २. मन्त्र (यन्त्र) संकेत और ३. पूजासंकेत - इन तीनों को जो जानता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
वाण, २. इतर, ३. स्वयम्भू नामक तीन लिङ्गों की संस्थिति को वस्तुतः जो जानता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
१. आणव (आत्मज) २. कार्मण (कर्मज) और ३. मायीय (मायिक) - इन तीन मलों को शुद्ध करने में जो समर्थ हैं, वह श्रेष्ठ गुरु है।
१. रक्त, २. शुक्ल एवं ३. मिश्र (कृष्ण) नामक तीन चरणों की वासना (भावना) को जो जानता है, हे महादेवि! वह गुरु श्रेष्ठ है।
१. महामुद्रा, २. नभोमुद्रा, ३. उड्डीयान, ४. जलन्धर और ५. मूल्बन्ध को जो जानता है, वह श्रेष्ठ गुरु है।
शिव से क्षितिपर्यन्त ३६ तत्त्वों का निर्णय है, उसे जो वस्तुतः जानता है, वह श्रेष्ठ गुरु है। विमर्श - शिव तत्त्व, शक्ति तत्त्व, सदाशिव तत्त्व, ईश्वर तत्त्व, सुधा विद्या तत्त्व और माया, पञ्चकञ्चुक, पुरुष, प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, मन, पश्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चतन्मात्रा और पञ्चमहाभूत ३६ तत्त्व।
हे प्रिये! अन्तर्याग, बहिर्याग, कला, ज्ञान, स्थिति और सुन्दरयन्त्र विधान को जो जानता है, हे प्रिये। वह गुरु कहा गया है।
पिण्ड और ब्रह्माण्ड के ऐक्य को तथा शिरा, अस्थि, रोम की संख्यादि को जो वस्तुतः जानता है; हे प्रिये! वह गुरु है अन्य नहीं।
पद्मादि ८४ आसनों और यमादि अष्टाङ्गयोग का जो ज्ञाता है, वही श्रेष्ठ 'गुरु' है।
१. घृणा (या तृष्णा), २. शङ्का (या शोक), ३. भय, ४. लज्जा, ५. जुगुप्सा, ६. कुल, ७. शील तथा ८. जाति - ये आठ पाश कहे गये हैं।
पाश से बँधा हुआ 'पशु' और पाश से छूटा हुआ 'शिव' माना गया है। अतः जो पाशों को दूर करता है; वही श्रेष्ठ 'गुरु' है।
योनिमुद्रा का बाँधना, मन्त्रचैतन्य विधि और यन्त्र-मन्त्र का स्वरूप जो जानता है, हे प्रिये! वह श्रेष्ठ गुरु है।
१. विनिक्षिप्त, २. गत आयात, ३. संक्लिष्ट और ४. विनीतक - मन की इन चार अवस्थाओं को जो जानता है, हे प्रिये! वह श्रेष्ठ गुरु है।
मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक सात पद्मदलों में जीव की गति का फल जो जानता है, हे प्रिये! वह गुरु है अन्य नहीं है।
शिव से गुरु तक की परम्परा के क्रम से तत्त्वसम्भार का जो ज्ञाता है, हे प्रिये! वहीं श्रेष्ठ गुरु है।
जिसके द्वारा तत्त्वज्ञान कराने पर साधक उसमें तुरन्त तन्मय होकर अपने को मुक्त अनुभव करने लगे, हे प्रिये! वही श्रेष्ठ गुरु है।
जो सहजानन्द देकर इन्द्रियजन्य सुख की आसक्ति को दूर करते हैं, वही गुरु सेवनीय हैं, अन्यों को ठग समझकर शिष्य त्याग दें।
संसार के भय से डरे हुये शिष्य को व्रतोपवास नियमों से नियन्त्रित करने वाला ही 'गुरु' है।
जो क्षण भर में प्रसन्न होकर मोक्षरूपी रत्न प्रदान करता है, उसे संसार से उद्धार करने वाला देव दुर्लभ गुरु समझे।
जो क्षण भर में किसी क्रिया या परिश्रम के बिना अपनी शक्ति शिष्य को देता है वह गुरु देवताओं को भी दुर्लभ है।
जो तुरन्त आश्वस्त करता है और आत्मसुखदायक ज्ञानोपदेश देता है, वह 'गुरु' देवताओं को भी दुर्लभ है।
हे देवि! जैसे एक द्वीप से दूसरे द्वीप में सहज ही जाना होता है, वैसे हो अभ्यासादि के बिना जो ज्ञान प्रदान करता है, वही श्रेष्ठ 'गुरु' है।
जैसे भूखे को भोजन मिलने से तुरन्त तृप्ति होती है, वैसे ही उपदेश मात्र से ज्ञान देने वाला 'गुरु' दुर्लभ है।
घर-घर में दीपक के समान गुरु बहुत हैं, किन्तु हे देवि! सूर्य के समान समस्त ज्ञान का दाता गुरु दुर्लभ है।
वेद-शास्त्रादि के मर्मज्ञ गुरु बहुत है, किन्तु हे देवि! परत्तत्त्व के अर्थ को जानने वाला गुरु दुर्लभ है।
पृथ्वी पर ऐसे गुरु बहुत है, जो अपना ज्ञान दूसरे को देते हैं किन्तु हे देवि! संसार में आत्मज्ञान को प्रकाशित करने वाला गुरु दुर्लभ है।
निन्द्य मन्त्र और औषधि को जानने वाले गुरु बहुत हैं किन्तु निगमागम शास्त्र में कथित मन्त्रों का ज्ञाता गुरु पृथ्वी दुर्लभ है।
शिष्य के धन को लेने वाले गुरु बहुत है किन्तु हे देवि! उस शिष्य के दुःख को दूर करने वाला गुरु दुर्लभ है।
वर्णाश्रम और कुलाचार में तत्पर गुरु पृथ्वी पर बहुत है किन्तु सभी सङ्कल्पों से रहित गुरु दुर्लभ है।
जिस गुरु के सम्पर्क मात्र से परमानन्द का अनुभव हो, उसी को बुद्धिमान् व्यक्ति गुरु बनाए, अन्यों को नहीं।
जिसकी बुद्धि अनुभव तक पहुँची हुई है, उसके दर्शन मात्र से मुक्ति मिलती है, इसमें सन्देह नहीं।
शङ्का के द्वारा चराचर तीनों लोक नष्ट हो जाते हैं, हे देवि! उस शङ्का को जो नष्ट करता है, वह गुरु दुर्लभ है।
जैसे अग्नि के पास रखा मक्खन पिघल कर विलीन हो जाता है, वैसे ही सद्‌गुरु के पास पाप विलीन हो जाता है।
जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखी और गीली लकड़ी को क्षण भर में भस्म कर देती है, वैसे ही गुरु (कृपा) का कटाक्ष शिष्य के पाप को क्षण भर में नष्ट कर देता है।
जैसे तेज हवा से उड़ाई हुई रुई दस दिशाओं में फैल जाती है, वैसे ही गुरु की करुणा से पाप राशि उड़ा दी जाती है।
दीप के दर्शनमात्र से जैसे अन्धकार का नाश हो जाता है, हे देवि! वैसे ही सद्‌गुरु के दर्शन मात्र से अज्ञान नष्ट हो जाता है।
सर्वलक्षणसम्पन्न, वेदशास्त्रविधि एवं विधान को जानने वाले और सभी उपायों के ज्ञाता, तत्त्वज्ञानी ही गुरु है।
जो तत्त्व को नहीं जानता, उसकी पूजा, होम, आश्रमाचार, तप, तीर्थ, व्रतादि और मन्त्रागमादि का विज्ञान निष्फल होता है।
परम तत्त्व को स्वयं जानने पर ही निश्चल आत्म ज्ञान होता है। जिसकी आत्मा पर अनुग्रह नहीं हुआ है, वह दूसरे पर अनुग्रह कैसे कर सकता है?
अपने शरीर में स्थित मन के प्रत्यक्ष ब्रह्मात्मक स्वरूप को जो नहीं जानता, वह दूसरे को मोक्ष कैसे दे सकता है?
सर्व लक्षणों से हीन होता हुआ भी तत्त्व ज्ञानी ही 'गुरु' माना गया है क्योंकि तत्त्व ज्ञाता ही इस संसार में मुक्ति दाता है।
हे महेशानि! जो तत्त्वज्ञ है, वही साधुजनों को प्रबुद्ध करता है। तत्त्वहीन को अध्यात्म का तत्त्वज्ञान कैसे होगा।
तत्त्वज्ञ से उपदेश पाने वाले तत्त्वज्ञ होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। हे देवि! पशुओं से उपदेश पाने वाले पशु कहे जाते हैं।
हे देवि! विद्ध ही वेधन करता है, अविद्ध वेधक नहीं होता। मुक्त ही बद्ध को छुड़ाता है। जो मुक्त नहीं है, वह मोचक कैसे होगा?
विज्ञ ही मूर्ख का उद्धार करता है; मूर्ख मूर्ख का उद्धार नहीं करता। नौका ही शिला को पार लगाती है; शिला शिला को पार नहीं लगाती।
केवल संसार में लवलीन तत्त्वहीन गुरु को पाकर, हे प्रिये! मनुष्य इस लोक में या परलोक में कुछ भी फल नहीं पाता।
शैव मत में तीन प्रकार के गुरु कहे जाते हैं। वैष्णव मत में पाँच और वेदशास्त्रों में सैकड़ों गुरु कहे गये हैं। किन्तु कुलशास्त्र में एक ही गुरु बताया गया है।
१. प्रेरक, २. सूचक, ३. वाचक, ४. दर्शक, ५. शिक्षक और ६. बोधक - ये छः गुरु माने गये है।
इनमें से पाँच तो मात्र कार्यभूत गुरु है, छठा 'बोधक' गुरु कारण होता है। बहुत गुरुओं के होने पर भी जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, उसी की पादुका, हे महेशानि! पूजनीया है, इसमें सन्देह नहीं।
गुरु के लक्षणों से समन्वित एवं संशय को दूर करने वाले शानदायक गुरु को पाकर हे देवि! दूसरे गुरु का आश्रय नहीं लेना चाहिये।
यदि गुरु अनभिज्ञ हो, उसके द्वारा संशय का निराकरण न होता हो, तो दूसरे गुरु के पास जाने में दोष नहीं है।
जिस प्रकार शहद का लोभी भौरा एक फूल से दूसरे फूल को जाता है, उसी प्रकार शान के लोभी शिष्य को एक गुरु के पास से दूसरे गुरु के पास जाना चाहिये।
इस प्रकार संक्षेप में मैंने आपसे गुरु शिष्य के कुछ लक्षण कहे। अब हे कुलेशानि! आप और क्या सुनना चाहती हैं?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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