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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 6
सच्छिष्यन्तु कुलेशानि शुभलक्षणसंयुतम् । समाधि साधनोपेतं गुणशीलसमन्वितम् ॥ स्वच्छदेहाम्बरं प्राज्ञं धार्मिकं शुद्धमानसम् । दृढव्रतं सदाचारं श्रद्धाभक्तिसमन्वितम् ॥ दक्षमल्पाशिनं गूढचित्तं निर्व्याजसेवकम् । विमृश्यकारिणं वीरं मनोदारिद्र्यवर्जितम् ॥ सर्वकार्यातिकुशलं स्वच्छं सर्वोपकारिणम् । कृतज्ञं पापभीतञ्च साधुसज्जनसम्मतम् ॥ आस्तिकं दानशीलञ्च सर्वभूतहिते रतम् । विश्वासविनयोपेतं धनदेहाद्यवञ्चकम् ॥ असाध्यसाधकं शूरमुत्साहबलसंयुतम् । अनुकूलं क्रियायुक्तमप्रमत्तं विचक्षणम् ॥ हितसत्यमितस्मेर भाषणं मुक्तदूषणम् । सकृदुक्तगृहातार्थं चतुरं बुद्धिविस्तरम् ॥ स्वस्तुतौ परनिन्दायां विमुखं सुमुखं प्रिये । जितेन्द्रियं सुसन्तुष्टं धीमन्तं ब्रह्मचारिणम् ॥ त्यक्ताधिव्याधिचापल्यदुः खभ्रान्तिमसंशयम् ।
हे कुलेशानि! सच्छिष्य शुभ लक्षणों से युक्त होता है। समाधि साधनों से युक्त, गुणशील वाले, शुद्ध शरीर एवं वस्त्र वाले, प्राज्ञ, धार्मिक, शुद्धमन, दृढ़व्रती, सदाचारी, श्रद्धा भक्ति से युक्त, समर्थ अल्पभोजी, गूढ़चित्त, निःस्वार्थ सेवा करने वाले, विवेकी, वीर, दरिद्रता से रहित, मन वाले, सब कार्यों में कुशल, स्वच्छ, सर्वोपकारी, कृतज्ञ, पाप से डरने वाले, साधु सज्जन से सम्मत, आस्तिक, दानी, सब प्राणियों की भलाई करने वाले, विश्वास और नम्रता से युक्त, धन एवं देह के अवश्ञ्चक, असाध्य को सिद्ध करने वाले, शूर, उत्साह, बल से युक्त, अनुकूल कार्य करने वाले, अप्रमादी, बुद्धिमान्, प्रिय, सत्य, अल्प और सहर्ष बोलने वाले, दोषमुक्त, एक बार कहे को समझने वाले, चतुर, अपनी प्रशंसा और दूसरी की निन्दा से विमुख, सुमुख, जितेन्द्रिय, सन्तुष्ट, धीमान्, ब्रह्मचारी, आदि से रहित, आधि, व्याधि, चापल्य, दुःख, प्रान्ति व सन्देह से रहित शिष्य ग्राह्य है।
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