द्वीपाद् द्वीपान्तरं देवि सञ्चरेद्यथा तथा ।
यो दद्यात् स गुरुर्ज्ञानमभ्यासादिविवर्जितम् ॥
हे देवि! जैसे एक द्वीप से दूसरे द्वीप में सहज ही जाना होता है, वैसे हो अभ्यासादि के बिना जो ज्ञान प्रदान करता है, वही श्रेष्ठ 'गुरु' है।
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