अनभिज्ञं गुरुं प्राप्य सदा संशयकारकम् ।
गुर्वन्तरन्तु गत्वा स नैतद्दोषेण लिप्यते ॥
यदि गुरु अनभिज्ञ हो, उसके द्वारा संशय का निराकरण न होता हो, तो दूसरे गुरु के पास जाने में दोष नहीं है।
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